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अरहर और उड़द जैसी दालें आस्ट्रेलिया व मोजांबिक से मंगाकर भारत महंगाई पर काबू पायेगा

टमाटर के बेतहाशा बढ़ें दामों की वजह से दालों की बढ़ती कीमतों की ख़बरें भले ही दब गयी हों लेकिन भारत दालों की बढ़ती कमी का सामना बीते पांच साल से कर रहा है। भारत में दलहन के उत्पादन और खबर के बीच बड़ा अंतर है। इसी संकट के मद्देनजर भारत और मोजांबिक के बीच एक समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत मोजांबिक में अरहर और उड़द की दालों का उत्पादन बढ़ाया जाएगा। उस बढ़े हुए उत्पादन को बाद में भारत खरीद लेगा। ऐसा ही एक समझौता भारत और आस्ट्रेलिया के बीच भी हुआ है। एक जानकारी के अनुसार मौजूदा में मोजांबिक से भारत लगभग एक मिलियन लाख टन दालें हर साल आयात करता है। अगले पांच साल में इसे दो मिलियन टन तक ले जाने की योजना बनाई गई है।

ऐसे में, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, म्यांमार और कुछ अफ्रीकी देशों से दालें आयात की जाती हैं। ऑस्ट्रेलिया भारत के लिए दालों का बड़ा निर्यातक है, लेकिन इस साल ऑस्ट्रेलिया में फसल अच्छी नहीं हुई है, इसलिए भी दालों की कीमतें बढ़ी हुई हैं।

  •  लगातार दो साल मानसून खराब होने से घरेलू उत्पादन कम हुआ है, यह भी किल्लत की एक वजह है। सरकार की योजना यह भी है कि दालों का इतना बड़ा सुरक्षित भंडार रखा जाए, जिसका इस्तेमाल दाम बढ़ने की स्थिति में दामों को नियंत्रण में रखने के लिए किया जा सके। अगर सरकार लगभग दो-ढाई लाख टन दालों का भंडार रख सके, तो यह दामों को प्रभावित करने में कारगर हो सकता है।
  • सरकार की योजना यह भी है कि म्यांमार से भी मोजांबिक की तरह का समझौता किया जाए। यह संभावना है कि भारत में दालों की खपत अगले आठ-दस साल तक बढ़े और फिर वहीं स्थिर हो जाए।

खपत बढ़ने की वजह गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार है, जिससे उनके भोजन में प्रोटीन की मात्रा बढ़ने लगी है। लगभग पांच साल बाद भारत की आबादी भी लगभग स्थिर हो जाएगी, जिसके कुछ समय बाद दालों की खपत भी बढ़ना बंद हो जाए।

भारत की योजना मोजांबिक में एक रिवर्स स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाने की भी है, जिसका इस्तेमाल भारत को दालें भेजने के लिए होगा। मोजांबिक के किसान भारत के लिए दालों का उत्पादन करेंगे और भारत मोजांबिक को यह गारंटी देगा कि वह दालों की पूरी फसल खरीद लेगा। जब योजना कार्यान्वित हो जाएगी, तो भारत में दालों की कीमतों पर नियंत्रण होना संभव होगा, क्योंकि निकट भविष्य में यह संभव नहीं लगता कि घरेलू उत्पादन से भारत में दालों की जरूरत पूरी हो सके। हर साल भारत में लगभग 17 मिलियन टन दालें पैदा होती हैं और यह जरूरत से लगभग पांच लाख टन कम है। इस कमी को आयात से पूरा किया जाता है। पांच मिलियन टन बहुत बड़ी मात्रा है, इसमें अगर किसी वजह से कमी हो जाए, तो दालों के भाव तेजी से बढ़ने लगते हैं। पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां प्रोटीन की जरूरत बड़ी हद तक दालों से पूरी होती है।

भारतीय उप-महाद्वीप के अलावा बाकी दुनिया में दालों की खपत बहुत कम होती है, इसलिए जिन अन्य देशों में दालें उगाई जाती हैं, वे भारत को निर्यात करने के लिए ही उगाई जाती हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में दालों की मांग तेजी से बढ़ी है, जबकि उस हद तक उत्पादन नहीं बढ़ा है। ऐसी स्थिति में, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, म्यांमार और कुछ अफ्रीकी देशों से दालें आयात की जाती हैं। ऑस्ट्रेलिया भारत के लिए दालों का बड़ा निर्यातक है, लेकिन इस साल ऑस्ट्रेलिया में फसल अच्छी नहीं हुई है, इसलिए भी दालों की कीमतें बढ़ी हुई हैं। गौरतलब है कि लगातार दो साल मानसून खराब होने से घरेलू उत्पादन कम हुआ है, यह भी किल्लत की एक वजह है। सरकार की योजना यह भी है कि दालों का इतना बड़ा सुरक्षित भंडार रखा जाए, जिसका इस्तेमाल दाम बढ़ने की स्थिति में दामों को नियंत्रण में रखने के लिए किया जा सके। माना जा रहा है कि अगर सरकार लगभग दो-ढाई लाख टन दालों का भंडार रख सके, तो यह दामों को प्रभावित करने में कारगर हो सकता है। सरकार की योजना यह भी है कि म्यांमार से भी मोजांबिक की तरह का समझौता किया जाए। यह संभावना है कि भारत में दालों की खपत अगले आठ-दस साल तक बढ़े और फिर वहीं स्थिर हो जाए।

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