भारत एक ऐसे ऐतिहासिक आर्थिक परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा है जो आने वाले दशकों में वैश्विक संतुलन को बदल सकता है। डीबीएस बैंक (DBS Bank) की कार्यकारी निदेशक और वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत वर्ष 2040 तक 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर सकता है।
यह रिपोर्ट, जिसका शीर्षक है “India 2025–40 Outlook: Pivotal Juncture,” भारत के विकास को आगे बढ़ाने वाले चार प्रमुख “D” यानी विकास (Development), विविधीकरण (Diversification), डिजिटलाइजेशन (Digitalisation) और डिकार्बोनाइजेशन (Decarbonisation) को भारत के भविष्य की सफलता का आधार बताती है।
विकास: 10 ट्रिलियन डॉलर की नींव तैयार करना
रिपोर्ट के अनुसार, भारत 2025 से 2040 के बीच औसतन 6.7% की दर से वृद्धि कर सकता है, जबकि अनुकूल परिस्थितियों में यह 7% से अधिक भी हो सकती है।
यह वृद्धि पूंजी निर्माण, मानव संसाधन विकास और उत्पादकता बढ़ाने पर निर्भर करेगी। 2040 तक भारत की कार्यशील जनसंख्या 90 करोड़ से अधिक होगी, जिसे कौशल, शिक्षा और स्वास्थ्य निवेश के माध्यम से उत्पादक शक्ति में बदलना होगा।
सरकारी योजनाएँ जैसे गति शक्ति, राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति इस दिशा में रोजगार और उत्पादकता को नई गति देंगी।
विविधीकरण: वैश्विक स्तर पर भारत की पहचान
भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः घरेलू उपभोग पर आधारित है, लेकिन अब यह वैश्विक एकीकरण और निर्यात विस्तार की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएँ, मुक्त व्यापार समझौते (FTA) और हाई-टेक विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली नीतियाँ भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में “China+1” विकल्प के रूप में स्थापित कर रही हैं।
भारत का लक्ष्य है कि 2040 तक निर्यात को जीडीपी के 21% से बढ़ाकर 30–32% तक पहुँचाया जाए।
तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्य विनिर्माण केंद्रों के रूप में उभर रहे हैं, जबकि गिफ्ट सिटी (GIFT City) भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और तकनीकी केंद्र बन रहा है, जहाँ 2026 तक 100 अरब डॉलर से अधिक बैंकिंग संपत्तियाँ होने का अनुमान है।
डिजिटलाइजेशन: नवाचार और उत्पादकता की नई शक्ति
भारत का डिजिटल परिवर्तन उसकी आर्थिक प्रगति का प्रमुख स्तंभ बन चुका है।
आधार, यूपीआई (UPI) और डिजीलॉकर (DigiLocker) जैसी पहलों ने वित्तीय समावेशन और शासन को सरल बनाया है।
रिपोर्ट के अनुसार, अब अगला चरण कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा एनालिटिक्स और ऑटोमेशन द्वारा संचालित होगा।
भारत में मौजूद ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCCs) अब बैक-ऑफिस की भूमिका से आगे बढ़कर नवाचार और अनुसंधान के केंद्र बन रहे हैं।
वर्तमान में ये केंद्र 65 अरब डॉलर का वार्षिक राजस्व उत्पन्न कर रहे हैं और 20 लाख से अधिक पेशेवरों को रोजगार दे रहे हैं। 2030 तक इनका राजस्व 100 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।
डिकार्बोनाइजेशन: हरित विकास की राह
भारत की दीर्घकालिक समृद्धि उसके जलवायु संक्रमण (climate transition) को कैसे संभालता है, इस पर निर्भर करेगी।
भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन और 2030 तक 50% अक्षय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है।
वर्तमान में देश की स्थापित बिजली क्षमता में 45% से अधिक हिस्सेदारी नवीकरणीय ऊर्जा की है।
सरकार ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर और सर्कुलर इकोनॉमी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ा रही है।
राव का कहना है कि भारत का ऊर्जा संक्रमण समावेशी होना चाहिए, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भर समुदायों को पुन: कौशल (reskilling) और रोजगार अवसरों के माध्यम से सुरक्षा मिल सके।
विकसित भारत की दृष्टि
डीबीएस की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का लक्ष्य 2047 तक “विकसित भारत” (Viksit Bharat) बनना है।
राव का कहना है, “आने वाला दशक भारत के लिए एक आर्थिक पुनर्जागरण (economic renaissance) का अवसर है — ऐसा अवसर जो दुनिया में भारत की भूमिका को नई परिभाषा दे सकता है, बशर्ते नीतियाँ दूरदर्शी, साहसिक और 4D ढाँचे पर आधारित हों।”