नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव और एल नीनो की आशंकाओं के बीच भारत की लगभग ₹52 लाख करोड़ की कृषि अर्थव्यवस्था पर जोखिम लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक फसल बीमा के साथ-साथ पैरामीट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस (Parametric Climate Insurance) किसानों को मौसम से जुड़े जोखिमों से त्वरित राहत देने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। इसके लिए सरकार और निजी क्षेत्र के बीच मजबूत साझेदारी की आवश्यकता है, ताकि मौसम आधारित बीमा और जलवायु जोखिम से जुड़े नए बीमा उत्पाद विकसित किए जा सकें।

भारत में कृषि पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब अस्थायी नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक जोखिम (Structural Risk) बनता जा रहा है। मानसून के बदलते स्वरूप ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। अब बारिश तय समय पर नहीं होती, बल्कि कभी देर से आती है, तो कभी अचानक अत्यधिक वर्षा के रूप में खेतों में बाढ़ ला देती है, जिससे फसलें और मिट्टी के पोषक तत्व दोनों प्रभावित होते हैं।

मानसून का बदलता पैटर्न बढ़ा रहा जोखिम

आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में देश के 55 प्रतिशत तहसीलों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान वर्षा में वृद्धि दर्ज की गई, जबकि करीब 11 प्रतिशत तहसीलों में सामान्य से 10 प्रतिशत से अधिक वर्षा की कमी रही। वहीं, 64 प्रतिशत तहसीलों में भारी बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ी है, जिससे कृषि क्षेत्र में अनिश्चितता और बढ़ गई है।

2026 में एल नीनो का असर पड़ने की आशंका

विशेषज्ञों के मुताबिक, 2026 में एल नीनो का प्रभाव भारत के मानसून को कमजोर कर सकता है। इसके कारण मानसून में देरी, सामान्य से कम वर्षा, लंबे शुष्क अंतराल और दक्षिण भारत में अत्यधिक गर्मी की स्थिति बन सकती है। विशेष रूप से तमिलनाडु और केरल जैसे जल-संवेदनशील क्षेत्रों में केला, इलायची और अदरक जैसी फसलों पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका है।

वर्तमान मानसून सीजन में भी देशभर में मौसमी वर्षा सामान्य से 13 प्रतिशत कम दर्ज की गई है, जिससे कृषि क्षेत्र की चिंताएं और बढ़ गई हैं।

वर्षा आधारित खेती सबसे अधिक प्रभावित

भारत में आज भी करीब 60 प्रतिशत कृषि क्षेत्र वर्षा आधारित (Rainfed Agriculture) है और यही क्षेत्र देश के लगभग 40 प्रतिशत खाद्यान्न उत्पादन में योगदान देता है। कमजोर या अनियमित मानसून केवल फसल उत्पादन ही नहीं घटाता, बल्कि किसानों की आय, पशुपालन, खाद्य महंगाई, ग्रामीण कर्ज, महिलाओं के कार्यभार और ग्रामीण पलायन को भी प्रभावित करता है।

इन फसलों पर सबसे ज्यादा खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि एल नीनो और अनियमित मानसून का सबसे अधिक असर धान, नारियल, रबर, चाय, इलायची, मसाले, कॉफी, सुपारी, सब्जियां और अल्प अवधि वाली फसलों पर पड़ सकता है।

क्या है पैरामीट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस?

पैरामीट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस में किसानों को फसल के वास्तविक नुकसान का आकलन करने के बजाय पूर्व निर्धारित मौसम संकेतकों, जैसे वर्षा, तापमान या हवा की गति के आधार पर बीमा भुगतान किया जाता है। यदि निर्धारित सीमा से कम बारिश या अधिक तापमान जैसी स्थिति बनती है, तो किसानों को बिना लंबी सर्वे प्रक्रिया के तेजी से मुआवजा मिल सकता है।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर जोर

विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर मौसम आधारित बीमा योजनाओं को मजबूत करें और गर्मी, वर्षा, पशुधन तथा मत्स्य पालन के लिए नए जलवायु-आधारित बीमा उत्पाद विकसित करें। इससे किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से बेहतर सुरक्षा मिलेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अधिक लचीली बन सकेगी।