मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शुक्रवार को घोषणा की कि राज्य सरकार इस साल सोयाबीन फसल के लिए भावांतर योजना लागू करेगी। इस योजना के तहत किसानों को बाजार भाव और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के बीच के अंतर की राशि (डिफरेंशियल अमाउंट) का भुगतान किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार किसानों को सोयाबीन की उचित कीमत दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। किसानों और किसान संगठनों के सुझावों पर राज्य सरकार ने सोयाबीन उत्पादकों को भावांतर योजना का लाभ देने का निर्णय लिया है। उन्होंने बताया कि किसान पहले की तरह ही मंडियों में अपनी फसल बेचते रहेंगे, और यदि उत्पाद की कीमत MSP से कम रहती है तो सरकार नुकसान की भरपाई करेगी।
2025-26 सीजन के लिए सोयाबीन का MSP ₹5,328 प्रति क्विंटल है, जबकि मध्यप्रदेश में किसानों ने 1-25 सितंबर के बीच औसतन ₹4,121 प्रति क्विंटल में सोयाबीन बेचा। पूरे देश का औसत मूल्य ₹4,141 प्रति क्विंटल रहा। शुक्रवार को मंडियों में सोयाबीन का भाव ₹3,837 प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जो इस माह के औसत मूल्य से भी कम है। राज्यभर की मंडियों में शुक्रवार को 9,080 टन सोयाबीन की आवक हुई।
दूसरी ओर, राज्य के कृषि परामर्श परिषद के पूर्व सदस्य केदार सिरोही ने कहा कि सोयाबीन के लिए भावांतर भुगतान योजना की घोषणा ने 2017 के कड़वे अनुभवों को ताजा कर दिया है। उन्होंने MSP पर सीधी खरीद की मांग करते हुए कहा कि सरकार के “डिफरेंशियल प्राइस” की गणना में खामी है।
सिरोही ने आरोप लगाया कि योजना में किसानों को बाजार भाव और MSP के बीच का अंतर देने का वादा किया जाता है, लेकिन वास्तव में यह अंतर मासिक मॉडल प्राइस पर आधारित होता है, जिससे किसानों को पूरा लाभ नहीं मिल पाता। इस अंतर की गणना और आधार सरकार सार्वजनिक नहीं करती।
उन्होंने याद दिलाया कि 2017 में योजना की सीमित अवधि (60 दिन) के कारण मंडियों में अचानक आवक बढ़ गई थी, जिससे मांग से अधिक आपूर्ति हो गई और बाजार मूल्य ₹800-1,200 प्रति क्विंटल (30-35%) तक गिर गए, जबकि अंतरराष्ट्रीय दाम स्थिर रहे। किसानों को अंतर की राशि भी 1-1.5 महीने की देरी से मिली थी।
सिरोही ने सरकार से आग्रह किया कि योजना लागू करने से पहले किसानों से ऑनलाइन फीडबैक लिया जाए कि वे अपनी फसल भावांतर योजना के तहत बेचना चाहते हैं या सीधे MSP पर। अगर किसान सहमत नहीं हों, तो MSP पर सीधी खरीद की व्यवस्था की जाए।