नई दिल्ली। भारतीय वैज्ञानिकों ने कृषि जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए दुनिया का पहला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित जीन एडिटिंग टूल विकसित किया है, जो पौधों की डीएनए संरचना में सटीक बदलाव करने में सक्षम है। यह उपलब्धि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (CRRI), कटक के वैज्ञानिकों ने हासिल की है।

यह नई तकनीक मौजूदा CRISPR सिस्टम से एक कदम आगे मानी जा रही है। अब तक जीन एडिटिंग तकनीक प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीवों के प्रोटीन पर आधारित थी, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली बार AI की मदद से पूरी तरह नए एंजाइम डिजाइन किए हैं, जो पौधों में प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं।

जीन एडिटिंग तकनीक को वैज्ञानिक “मॉलिक्यूलर स्कैल्पेल” यानी आणविक कैंची की तरह मानते हैं, जिसकी मदद से पौधों के डीएनए के विशेष हिस्सों को काटकर उनमें बदलाव किया जा सकता है। इससे अधिक उत्पादन, जलवायु सहनशीलता और रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली फसलें विकसित की जा सकती हैं, वह भी बिना किसी बाहरी जीन को जोड़े।

इस शोध का नेतृत्व वैज्ञानिक कुतुबुद्दीन अली मोल्ला ने किया। उन्होंने बताया कि AI द्वारा डिजाइन किए गए एंजाइम पौधों के डीएनए में सटीक बदलाव करने में सक्षम हैं। यह तकनीक जीन नॉकआउट, बेस एडिटिंग और प्राइम एडिटिंग जैसे कार्यों को सफलतापूर्वक कर सकती है।

हालांकि अमेरिका की एक कंपनी पहले मानव कोशिकाओं के लिए इसी तरह की AI आधारित प्रणाली विकसित कर चुकी है, लेकिन पौधों में इसका सफल प्रयोग पहली बार भारत में हुआ है।

नई तकनीक को “प्लांट-ओपनक्रिस्पर1” (POC1) नाम दिया गया है। यह “ओपनक्रिस्पर-1” (OC1) नामक AI-जनित न्यूक्लिएस पर आधारित है, जिसे पहले मानव कोशिकाओं के लिए विकसित किया गया था। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तक जीन एडिटिंग मुख्य रूप से Cas9 और Cas12a जैसे सीमित बैक्टीरियल एंजाइमों पर निर्भर थी, जिनकी पौधों में कुछ सीमाएं थीं।

मोल्ला के अनुसार AI आधारित प्रोटीन डिजाइनिंग अब जीन इंजीनियरिंग में बड़ा बदलाव ला रही है। बड़े भाषा मॉडल (Large Language Models) और विशाल प्रोटीन डाटाबेस की मदद से नई पीढ़ी के जीन एडिटिंग टूल विकसित किए जा रहे हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक कृषि और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इससे कम लागत वाले, अधिक प्रभावी और अनुकूलित जीन एडिटिंग सिस्टम विकसित करने का रास्ता खुलेगा। साथ ही यह मौजूदा CRISPR तकनीकों से जुड़े पेटेंट संबंधी प्रतिबंधों को कम करने में भी मददगार साबित हो सकती है।

इस शोध टीम में CRRI, कटक के वैज्ञानिक प्रिया दास, रोमियो साहा, देबस्मिता पांडा, चंदना घोष, एस. पी. अविनाश, सोनाली पांडा और मिर्जा जे. बेग शामिल रहे। शोध को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल “न्यू फाइटोलॉजिस्ट” में प्रकाशन के लिए स्वीकार किया गया है।