कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएआई) ने कहा है कि अतिरिक्त लंबे रेशे (एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल – ELS) कपास को शून्य सीमा शुल्क श्रेणी में शामिल करने का सरकार का निर्णय भारतीय वस्त्र और परिधान निर्यात को नई मजबूती देगा। बजट 2026-27 में ईएलएस कपास को सीमा शुल्क की प्रथम अनुसूची में शामिल किए जाने से इस पर प्रभावी रूप से आयात शुल्क समाप्त हो गया है।

सीएआई के अनुसार, यह कदम उच्च मूल्य वाले वस्त्र, प्रीमियम परिधान और वैश्विक ब्रांडों के लिए बनने वाले कपड़ों के उत्पादन को प्रतिस्पर्धी बनाएगा।

भविष्योन्मुखी बजट: सीएआई

सीएआई के अध्यक्ष विनय एन कोटक ने कहा कि बजट 2026-27 एक भविष्योन्मुखी और विकासोन्मुखी ढांचा प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को सुदृढ़ करना है।

उन्होंने कहा,
“विनिर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए सीमा शुल्क संरचना में किए गए प्रमुख सुधारों में ईएलएस कपास को शून्य शुल्क श्रेणी में शामिल करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे तैयार वस्त्रों के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और वैश्विक वस्त्र बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी।”

आयात निर्भरता और लागत में कमी

कोटक ने बताया कि भारत वर्तमान में अमेरिका और मिस्र से लगभग 5–7 लाख गांठें ईएलएस कपास का आयात करता है। चूंकि घरेलू उत्पादन सीमित है, इसलिए निर्यात-उन्मुख वस्त्र उद्योग को गुणवत्ता मानकों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।

ईएलएस कपास पर आयात शुल्क हटने से कच्चे माल की लागत घटेगी और भारतीय वस्त्र निर्माताओं को उच्च गुणवत्ता वाले रेशे सुलभ होंगे, जिससे उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत होगी।

प्रीमियम वस्त्रों के लिए अहम कच्चा माल

33 मिलीमीटर या उससे अधिक रेशे की लंबाई वाली कपास को ईएलएस कपास कहा जाता है। इसका उपयोग प्रीमियम धागे, महीन कपड़े और उच्च श्रेणी के परिधानों के निर्माण में किया जाता है, जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग है।

भारत में सीमित उत्पादन

देश में ईएलएस कपास की खेती लगभग 2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है। इसका प्रमुख उत्पादन:

  • कर्नाटक के धारवाड़, हावेरी और मैसूरु (डीसीएच-32 किस्म)
  • तमिलनाडु के कोयंबटूर, इरोड और डिंडीगुल
  • मध्य प्रदेश के रतलाम

जैसे सीमित क्षेत्रों तक ही केंद्रित है।

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि शून्य शुल्क नीति से भारत का वस्त्र निर्यात और अधिक मूल्य संवर्धित होगा तथा देश वैश्विक टेक्सटाइल सप्लाई चेन में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकेगा।