संसद में उठाए गए एक सवाल के लिखित जवाब में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में कहा कि स्वच्छ भारत मिशन – ग्रामीण (एसबीएम-जी) द्वितीय-चरण के अंतर्गत प्लास्टिक के कचरे का प्रबंधन करना जरूरी है।

मिशन के अंतर्गत, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (एसडब्ल्यूएम) के लिए 5,000 तक की आबादी वाले गांवों के लिए प्रति व्यक्ति 60 रुपये तक का दिए जाने का प्रावधान है, जबकि 5,000 से अधिक आबादी वाले गांवों के लिए प्रति व्यक्ति 45 रुपये दिए जाते है। इसके अलावा ब्लॉक स्तर पर प्लास्टिक के कचरे के प्रबंधन की इकाई की स्थापना के लिए प्रत्येक ब्लॉक के लिए 16 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है।

सिंह ने बताया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सलाह दी गई है कि वे घर-घर जाकर कचरा एकत्रित करना सुनिश्चित करें, साथ ही बायोडिग्रेडेबल और जो बायोडिग्रेडेबल नहीं है, दोनों प्रकार के कचरे के संग्रह और परिवहन के लिए वाहनों की खरीद के लिए वित्तपोषण प्रावधान करें। परिचालन दिशा-निर्देश प्रत्येक ब्लॉक में कम से कम एक (पीडब्लूएमयू) निर्धारित करें। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के लिए शहरी सुविधाओं का उपयोग करने की भी सलाह दी गई है।

एक अन्य जानकारी अनुसार प्लास्टिक जलाना ग्रामीण भारत में एक आम बात है। एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि भारत में औसतन 67 फीसदी ग्रामीण परिवार नियमित रूप से प्लास्टिक कचरा जलाते हैं। यह वो कचरा है जिन्हें कबाड़ी वाले भी नहीं खरीदते हैं। यह जानकारी संगठन प्रथम द्वारा जारी नई रिपोर्ट “रूरल प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट स्टडी 2022” में सामने आई है। इस रिपोर्ट में देश के 15 शहरों में 70 जिलों के कुल 700 गांवों को शामिल किया गया था। इस अध्ययन का लक्ष्य ग्रामीण भारत में प्लास्टिक कचरे की स्थिति को समझना था।

रिपोर्ट में जो निष्कर्ष सामने आए हैं उनके अनुसार देश के अधिकांश गांवों में कचरा प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचा नहीं है। जानकारी मिली है कि जहां केवल 36 फीसदी गांवों में कचरे के लिए सार्वजनिक कूड़ेदान की व्यवस्था है। वहीं करीब 70 फीसदी गांवों में कचरा जमा करने के लिए वाहन की व्यवस्था नहीं है, जबकि केवल 47 फीसदी गांवों में एक सफाई कर्मचारी है।