मुंबई। वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की कीमतों में तेज उछाल और पश्चिम एशिया संकट के बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संकेत दिए हैं कि सरकार किसानों पर बोझ न डालते हुए उर्वरकों की खुदरा कीमतें स्थिर रख सकती है, जैसा कि कोविड-19 के दौरान किया गया था।
मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि कोविड काल में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद सरकार ने महंगे दाम पर उर्वरक खरीदकर किसानों को पुराने रेट पर ही उपलब्ध कराए थे और सप्लाई भी बाधित नहीं होने दी गई थी।
वैश्विक बाजार में तेज उछाल
मार्च की शुरुआत से यूरिया की कीमतें 460 डॉलर प्रति टन से बढ़कर करीब 850 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई हैं, यानी लगभग 85% की वृद्धि। वहीं, डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की कीमतें 25–50% बढ़कर 850–1000 डॉलर प्रति टन के स्तर पर पहुंच गई हैं। ये दोनों भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले उर्वरक हैं।
सरकार ने बढ़ाई सब्सिडी
बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने खरीफ 2026 सीजन के लिए नॉन-यूरिया उर्वरकों पर प्रति किलोग्राम सब्सिडी दरों में 10–21% की बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। यह फैसला न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) स्कीम के तहत लिया गया है।
इस कदम से सरकारी खजाने पर करीब ₹41,534 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 12% अधिक है।
पश्चिम एशिया संकट का असर
भारत की उर्वरक आपूर्ति काफी हद तक पश्चिम एशिया पर निर्भर है—
- यूरिया की जरूरत का 20–30%
- डीएपी आयात का 30%
- एलएनजी आयात का लगभग 50%
संघर्ष के कारण अमोनिया, सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड जैसी कच्ची सामग्री की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है, जिससे घरेलू उत्पादन पर असर पड़ा है।
सब्सिडी पर बढ़ सकता है दबाव
FY27 के बजट में सरकार ने उर्वरक सब्सिडी को ₹1.7 लाख करोड़ पर रखा है, जो FY26 के संशोधित अनुमान ₹1.86 लाख करोड़ से 8.4% कम है। हालांकि, फरवरी 2026 तक ही सब्सिडी खर्च ₹1.88 लाख करोड़ को पार कर चुका है।
उत्पादन में गिरावट
घरेलू उत्पादन भी कमजोर रहा है—
- मार्च 2026 में यूरिया उत्पादन करीब 27% घटकर 1.8 मिलियन टन रह गया
- फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों का उत्पादन 16–24% घटकर 0.9–1.0 मिलियन टन रहा