लुधियाना जिले के दोराहा स्थित कतारी गांव के किसान परमजीत सिंह पन्नू ने यह साबित कर दिखाया है कि अगर जुनून और लगन हो तो छोटी खेती भी बड़े कारोबार में बदली जा सकती है। महज़ एक हेक्टेयर में अंगुली बाजरे (फिंगर मिलेट्स) की जैविक खेती से शुरू हुई उनकी यह यात्रा आज एक सफल एग्री-बिजनेस बन चुकी है।

परमजीत ने सबसे पहले मिश्रित खेती के साथ मिलेट की किस्मों पर प्रयोग शुरू किया और धीरे-धीरे बाजरे से आटा, बिस्किट और इंस्टेंट फूड जैसे उत्पाद बनाने शुरू किए। उन्होंने ‘Farmative’ नाम से ब्रांड लॉन्च कर एक खुदरा दुकान के ज़रिए बाजरे से बने उत्पादों की मार्केटिंग शुरू की, जिसमें सोशल मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई।

उनके नवाचार और प्रयासों को मान्यता मिली और वह TIGR2ESS Flagship Project 4 Programme के तहत Centre for International Projects Trust (CIPT) द्वारा संचालित किसान क्षमता-विकास कार्यक्रम का हिस्सा बने।

2010 में शुरू की गई इस यात्रा में उन्होंने कई चुनौतियों का सामना किया। “शुरुआत में मार्गदर्शन के लिए कोई नहीं था, लेकिन हौसले और लगातार प्रयासों से अच्छे परिणाम मिले,” परमजीत ने कहा। आज वे पारंपरिक खेती के विकल्प के रूप में बाजरे की खेती को बढ़ावा देने के लिए दृढ़ हैं।

बाजरे की बढ़ती मांग के चलते उन्होंने खरीफ सीजन में इसकी खेती का रकबा बढ़ा दिया है। उनका उत्पाद अब आढ़तियों के माध्यम से डेयरी किसानों तक पहुंच रहा है। “जैसे-जैसे लोग बाजरे की ओर बढ़ेंगे, इसकी मांग और कीमत दोनों में इजाफा होगा,” उन्होंने बताया।

परमजीत अब ‘Punjab Native Seed Growers’ समूह से भी जुड़े हैं, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खाद्य उत्सवों में भाग लेकर बाजरे की उपयोगिता और संभावनाएं दर्शा रहा है।

इसके अलावा, परमजीत अपने गांव के किसानों के साथ मिलकर बीज वितरण, उपज खरीद, भंडारण सुविधा और प्रशिक्षण जैसे कई कार्यों में सहयोग कर रहे हैं। उनका अगला लक्ष्य है एक फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइज़ेशन (FPO) बनाना, जिसमें आसपास के गांवों के किसानों को जोड़कर बाजरे की खेती, उत्पादन और प्रसंस्करण को बड़े स्तर पर बढ़ाना शामिल है।

परमजीत का मानना है कि पंजाब की ज़मीन में आज भी बहुत संभावनाएं हैं। “युवाओं को विदेश जाने की बजाय अपनी ज़मीन पर भरोसा करना चाहिए। यह ज़मीन अगर सही तरीके से उपयोग की जाए तो किसी खजाने से कम नहीं,” उन्होंने कहा।

हालांकि वे सरकार की नीतियों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने कहा, “सरकार की तरफ से प्रोत्साहन पर्याप्त नहीं है। किसानों को खुद आगे बढ़कर जल की कमी और पारंपरिक खेती की सीमाओं को समझते हुए वैकल्पिक खेती की ओर रुख करना होगा।”

परमजीत की यह कहानी कृषि विविधिकरण और आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल बन चुकी है।