कश्मीर के बडगाम जिले के चडूरा क्षेत्र का एक छोटा सा गांव बुगाम आज अपनी पहचान बदल रहा है। पारंपरिक सेब बागानों के लिए मशहूर इस इलाके के किसान अब सब्जी की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। बदलते मौसम और अनियमित जलवायु ने किसानों को मजबूर कर दिया कि वे अपनी परंपरागत फसलों के बजाय ऐसी खेती चुनें, जो उन्हें बेहतर आय और स्थिरता दे सके।

हर साल अप्रैल का महीना, जब सेब के पेड़ फूलों से लद जाते हैं, अब बुगाम के किसानों के लिए चिंता का कारण बन गया है। ओलावृष्टि, तेज हवाओं और भारी बारिश ने बागानों को बचाना मुश्किल कर दिया है। पर्यावरण विशेषज्ञ और शोधार्थी अब्दुल मजीद आहंगर कहते हैं, “गांव के लगभग सभी किसानों ने अब अपनी ज़मीन पर सब्जियां उगानी शुरू कर दी हैं ताकि उन्हें स्थायी और बेहतर आमदनी मिल सके।”

तीन बार फसल, ज्यादा मुनाफा
बुगाम के किसान बशीर अहमद बताते हैं, “सेब के बागानों से सब्जियों की खेती की तरफ जाना मेरे लिए एक बड़ा फैसला था। पहले मैं सेब उगाता था, लेकिन अप्रैल के महीने में बदलते मौसम के कारण हर साल घाटा उठाना पड़ता था। पिछले 15 वर्षों से सब्जी की खेती कर रहा हूं और सालभर बेहतर नतीजे मिल रहे हैं। अब बीज टनल की मदद से साल में तीन बार सब्जी उगा पाता हूं।”

किसान अब्दुल मजीद भट, जिनके पास लगभग 2 एकड़ जमीन है, कहते हैं, “सब्जी की खेती ज्यादा लाभदायक है क्योंकि इसमें साल में तीन बार फसल होती है। एक कनाल (1/8 एकड़) से हर साल 15 से 20 क्विंटल तक गोभी, पत्ता गोभी, खीरा, ब्रोकली और पालक जैसी सब्जियां उगाता हूं।”

‘मिनी पंजाब’ की पहचान
सब्जी उत्पादन की बढ़ती मात्रा के कारण बुगाम को अब ‘मिनी पंजाब’ कहा जाने लगा है। अब्दुल मजीद कहते हैं कि गांव के लोगों ने सिर्फ बागान ही नहीं, बल्कि धान के खेत भी सब्जियों के खेतों में बदल दिए हैं।

गांव के किसान सालभर खेतों में काम के लिए कश्मीर के अन्य इलाकों—पुंछ, डोडा, राजौरी और कुपवाड़ा—से मजदूर बुलाते हैं।

नौजवानों की नई उम्मीद
25 वर्षीय ग्रेजुएट इरफान बशीर ने भी सब्जी की खेती को अपना करियर बना लिया है। वे बताते हैं, “मैंने दसवीं कक्षा से ही सब्जी की खेती में पिता का हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। कभी-कभी मन में सवाल आता था कि बाकी लड़के पढ़ाई और मौज-मस्ती कर रहे हैं, और मैं खेतों में पसीना बहा रहा हूं। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ने मुझे इस व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।”

कश्मीर में बढ़ती बेरोजगारी ने भी इरफान को खेती के लिए प्रोत्साहित किया। वे कहते हैं, “अगर मैं ग्रेजुएट के बाद नौकरी ढूंढता तो शायद कुछ खास हासिल न कर पाता। आज मुझे गर्व है कि हम हर साल 500 क्विंटल से ज्यादा सब्जियां पैदा करते हैं और जरूरतमंद लोगों को रोजगार भी देते हैं।”