कश्मीर का पाम्पोर—जो कभी केसर की बैंगनी चादर में लिपटा दिखता था—आज तेज़ी से बदल रहा है। कभी घर-आंगनों से लेकर खेतों तक फैलने वाली महक अब सन्नाटे में बदल चुकी है। केसर उत्पादन में भारी गिरावट ने किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है, और यही कारण है कि यहां के किसान अब दुनिया के सबसे महंगे मसाले केसर को छोड़कर सेब की खेती की ओर बढ़ रहे हैं।

पाम्पोर के दसू गांव के केसर किसान मोहम्मद आसिफ आज़ाद बताते हैं कि इस साल उनकी 15 कनाल ज़मीन से सिर्फ 250 ग्राम केसर की उपज हुई—पिछले वर्ष के 1.5 किलोग्राम की तुलना में पांच गुना कम।

“इतनी कम पैदावार से मज़दूरों को दिया गया 35,000 रुपये भी नहीं निकल पाया,” वे कहते हैं।

करेवा का सिकुड़ना और सूखा—उत्पादन पर दोहरी मार

कश्मीर के करेवा, जो केसर के लिए सबसे उपजाऊ माने जाते हैं, पिछले वर्षों में तेज़ी से सिमट रहे हैं। मिट्टी की खुदाई, शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और खेती छोड़कर बागवानी की ओर रुख जैसे कारणों से 1993 में 4,496 हेक्टेयर से घटकर 2024 में यह भूमि 2,300 हेक्टेयर से भी कम रह गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 2024 जम्मू-कश्मीर के लिए 50 वर्षों का सबसे सूखा वर्ष रहा—बारिश में 29% की कमी दर्ज की गई।
SKUAST-कश्मीर के प्रोफेसर डॉ. एस.ए. दर कहते हैं—

“करेवा वर्षा पर निर्भर हैं, लेकिन लगातार सूखे और सिंचाई न होने से उत्पादन ढह रहा है। अगले साल स्थिति और खराब हो सकती है।”

केसर की जगह सेब—आसानी, कम खर्च और बेहतर मुनाफा

30 वर्षीय आसिफ आज़ाद ने अब अपनी ज़मीन पर हाई-डेंसिटी सेब बाग विकसित करना शुरू कर दिया है।

“एक कनाल सेब बाग से इस साल 55,000 रुपये मिले—जबकि केसर घाटे में जा रहा है,”
वे बताते हैं।
अब वे पूरी ज़मीन सेब बाग में बदलने की तैयारी कर रहे हैं। यही बदलाव पूरे पाम्पोर में दिखने लगा है—सैकड़ों किसान सेब को भविष्य मान रहे हैं।

सैफरन ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अब्दुल मजीद वानी हालात को बेहद गंभीर बताते हैं—

“इस साल उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में सिर्फ 10% रह गया। अगले पांच साल में केसर खेती खत्म होने के कगार पर है।”

सिंचाई मिशन विफल, बोरवेल बेकार पड़े

2010-11 में केंद्र सरकार ने केसर को पुनर्जीवित करने के लिए 400 करोड़ रुपये का नेशनल मिशन ऑन सैफरन शुरू किया था। इसके तहत पंपोर और बडगाम में 253 ट्यूबवेल और 3,700 स्प्रिंकलर लगाने थे। लेकिन किसान बताते हैं कि ज्यादातर ट्यूबवेल बंद पड़े हैं या चोरी हो चुके उपकरणों के कारण बेकार हैं।

सरकार किसानों से ट्यूबवेल स्वयं चलाने और डीज़ल खर्च उठाने की उम्मीद करती है, जबकि एक घंटे की सिंचाई में 4-5 लीटर डीज़ल लगता है—15-20 दिन चलाना किसानों के लिए असंभव है।

कॉर्म की अवैध बिक्री ने संकट बढ़ाया

SKUAST के शोधकर्ता डॉ. नियाज़ दर बताते हैं कि कॉर्म की कमी उत्पादन को चौपट कर रही है—

“आवश्यकता 6,600 MT की है, लेकिन कमी लगातार बढ़ रही है। कई किसान कॉर्म को सुरंगों से बाहर बेच देते हैं, जिससे घाटी में उत्पादन और गिरता है।”

कश्मीर कृषि विभाग कॉर्म की तस्करी रोकने के लिए कड़े प्रावधान वाले संशोधन पर काम कर रहा है। हाल ही में 150 किलो कॉर्म अवैध रूप से बाहर ले जाते हुए चार लोग पकड़े गए।

एग्री-बॉट्स उम्मीद जगा सकते हैं, पर किसान पूछते हैं—अब क्यों?

MeitY और SKUAST के सहयोग से AI आधारित एग्री-बॉट्स विकसित किए जा रहे हैं जो
फूल तोड़ने
कलियों की छंटाई
लाल केसरी धागे अलग करने
जैसे काम करेंगे—जो समय-संवेदनशील और मेहनतभरे हैं।

पर खेतों में सेब काटते किसान पूछते हैं—

“जब खेती ही छोड़नी पड़ रही हो, तो तकनीक का क्या फायदा?”

कश्मीर की केसर धरती सूख रही है—और किसान उम्मीद के साथ सेब की ओर बढ़ रहे हैं।
अगर जल्द नीतिगत और सिंचाई सुधार नहीं हुए, तो दुनिया की सबसे महंगी मसाला खेती इतिहास बन सकती है।