हिमाचल प्रदेश की शांत वादियों में, जहां हिमालय मौन प्रहरी की तरह खड़े हैं और ढलानों पर सेब के बागान फैले हुए हैं, वहां खेती की दुनिया में एक सशक्त और प्रेरक बदलाव आकार ले रहा है। इस बदलाव की अगुवाई कोई पारंपरिक किसान नहीं, बल्कि भारतीय सेना के एक सेवानिवृत्त अधिकारी कर रहे हैं। कर्नल (सेनि.) दिव्य ठाकुर ने वर्दी उतारने के बाद मिट्टी से रिश्ता जोड़ा और ऑर्गेनिक सेब उत्पादन को अपना नया मिशन बना लिया।
कर्नल दिव्य ठाकुर की यह यात्रा अनुशासन, ईमानदारी और सेवा की भावना से जुड़ी हुई है। वह चौथी पीढ़ी के सैन्य अधिकारी हैं और 1947 में कश्मीर की रक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह (महा वीर चक्र, मरणोपरांत) के पौत्र हैं। 37 वर्षों तक देश की सेवा करने के बाद वर्ष 2019 में सेवानिवृत्त हुए कर्नल ठाकुर के सामने अब एक नई चुनौती थी—भारतीय कृषि में ‘ऑर्गेनिक’ शब्द के दुरुपयोग को रोकना और उपभोक्ताओं का भरोसा वापस दिलाना।
सेना से सेब बाग तक का सफर
सेवानिवृत्ति के बाद कर्नल ठाकुर कुछ समय के लिए ग्रेटर नोएडा में रहे, जिसे वह “कूलिंग पीरियड” बताते हैं। मार्च 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान वह परिवार सहित हिमाचल प्रदेश चले आए, जहां उनके ससुर—स्वयं एक सेवानिवृत्त सेना जनरल—रहते हैं। इसी दौर में भविष्य को लेकर हुई गहन चर्चाओं ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
परिवार के पैतृक सेब बागान, जो वर्षों से ठेके पर दिया गया था, को दोबारा जीवित करने का सुझाव मिला। खेती का कोई पूर्व अनुभव न होने के बावजूद कर्नल ठाकुर ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने पूरे एक वर्ष तक सेब की खेती, मिट्टी की सेहत, पौध संरक्षण और बागवानी तकनीकों का अध्ययन किया। यही पैतृक बागान आगे चलकर उनके ऑर्गेनिक मिशन की नींव बना।
ट्रेंड नहीं, सिद्धांत है ऑर्गेनिक खेती
कर्नल ठाकुर का मानना है कि आज भारत में ‘ऑर्गेनिक’ शब्द एक फैशन बन चुका है, जहां कई उत्पाद बिना मानकों के ही ऑर्गेनिक बताकर बेचे जा रहे हैं। उन्होंने देखा कि कई किसान और व्यापारी रसायनों का इस्तेमाल करने के बावजूद अपनी उपज को ऑर्गेनिक बताकर ऊंचे दामों पर बेचते हैं।
इसी अनियमितता और ईमानदारी की कमी ने उन्हें एक उदाहरण पेश करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने आयातित M9 रूटस्टॉक और उन्नत किस्मों के साथ हाई-डेंसिटी सेब बागान की स्थापना की। यह बागान वर्तमान में सरकारी ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन की तीन वर्षीय कठोर प्रक्रिया से गुजर रहा है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यहां उगाया गया हर सेब पूरी तरह रसायन-मुक्त, ट्रेसेबल और वास्तविक ऑर्गेनिक हो।
तकनीक, टिकाऊपन और सामूहिक सोच
हाई-डेंसिटी सेब बागवानी पहाड़ी राज्यों के लिए एक आधुनिक और प्रभावी मॉडल मानी जाती है, जहां भूमि सीमित होती है। यह मॉडल कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और संसाधनों के कुशल उपयोग को संभव बनाता है। कर्नल ठाकुर ने इसे ऑर्गेनिक सिद्धांतों के साथ जोड़कर यह साबित किया है कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक लाभ एक साथ संभव हैं।
उनका प्रयास केवल अपने खेत तक सीमित नहीं है। वह अन्य किसानों को भी जागरूक कर रहे हैं, ज्ञान साझा कर रहे हैं और सामूहिक किसान सशक्तिकरण पर जोर दे रहे हैं। उनका उद्देश्य एक ऐसा किसान समुदाय तैयार करना है जो पारदर्शिता, नैतिक खेती और उपभोक्ता विश्वास को प्राथमिकता दे।
मिट्टी से थाली तक भरोसे की बहाली
कर्नल दिव्य ठाकुर की कहानी भारतीय कृषि के भविष्य की ओर इशारा करती है, जहां नवाचार के साथ-साथ ईमानदारी सबसे बड़ा आधार है। सेना के अनुशासन और पर्यावरणीय मूल्यों के संगम से वह यह दिखा रहे हैं कि सेवा केवल सीमाओं पर ही नहीं, खेतों में भी की जा सकती है।
जैसे-जैसे उपभोक्ता अपने भोजन को लेकर अधिक सजग हो रहे हैं, ऐसे प्रयास भारतीय खेती के लिए एक भरोसेमंद और टिकाऊ रास्ता दिखाते हैं—जहां देश सेवा के बाद धरती सेवा भी उतनी ही गर्व की बात बन जाती है।
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