केंद्र सरकार का दावा है कि वर्ष 2024–25 के दौरान देश में उर्वरकों (फर्टिलाइज़र) की रिकॉर्ड उपलब्धता सुनिश्चित की गई और किसानों को किसी भी समय कमी का सामना नहीं करना पड़ा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जहां देश की अनुमानित आवश्यकता 152.50 करोड़ बैग (72.204 मिलियन टन) थी, वहीं 176.79 करोड़ बैग (83.464 मिलियन टन) उर्वरक उपलब्ध कराए गए—यानी जरूरत से करीब 24 करोड़ बैग अधिक।

लेकिन सवाल यह नहीं है कि कागजों में कितनी खाद उपलब्ध थी। असली सवाल यह है कि जब रिकॉर्ड मात्रा में खाद थी, तो किसान समय पर खाद क्यों नहीं पा सके? क्यों किसानों को दिनों तक कतारों में खड़ा रहना पड़ा, कहीं रात भर लाइन लगानी पड़ी और कहीं खाली हाथ लौटना पड़ा?

दावों और जमीनी हकीकत के बीच टकराव

सरकार का कहना है कि भारतीय रेलवे ने खाद की ढुलाई को प्राथमिकता दी, बंदरगाहों पर आयातित उर्वरकों की तेज़ी से अनलोडिंग की गई, और भंडारण व वितरण व्यवस्था को मजबूत किया गया। इसके साथ ही खाद कंपनियों के साथ नियमित समीक्षा बैठकों और निरंतर निगरानी का भी दावा किया गया।

अगर ये सारी व्यवस्थाएं प्रभावी थीं, तो फिर मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में किसानों को खाद के लिए इतनी परेशानी क्यों झेलनी पड़ी?

खरीफ और रबी—दोनों मौसमों में संकट

हकीकत यह है कि खरीफ और रबी—दोनों फसली मौसमों में किसानों को उर्वरकों की भारी किल्लत का सामना करना पड़ा। कई इलाकों से कालाबाज़ारी की शिकायतें सामने आईं और मजबूरी में किसानों को निजी दुकानों से महंगे दामों पर खाद खरीदनी पड़ी। विडंबना यह रही कि उसी दौरान केंद्र और राज्य सरकारें लगातार यह दोहराती रहीं कि “देश में खाद की कोई कमी नहीं है।”

समस्या उत्पादन में नहीं, व्यवस्था में

अगर वास्तव में खाद की कमी नहीं थी, तो फिर किसानों तक समय पर खाद क्यों नहीं पहुंची? यह विरोधाभास साफ संकेत देता है कि समस्या उत्पादन या आयात में नहीं, बल्कि परिवहन, भंडारण और वितरण व्यवस्था में थी। जब मांग से ज्यादा खाद उपलब्ध थी, तो हर जिले और ब्लॉक तक उसकी समयबद्ध आपूर्ति क्यों नहीं सुनिश्चित की गई?

जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई?

क्या यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं है कि गोदामों में खाद भरी रही और किसान बुआई के समय खाद के लिए भटकते रहे? इस कुप्रबंधन का सबसे बड़ा बोझ किसानों ने उठाया। जिन जिलों में खाद समय पर नहीं पहुंची, वहां संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए थी, लेकिन अक्सर की तरह यह विफलता भी आंकड़ों के बोझ तले दबा दी गई।

तकनीक के दौर में भी कतारों में किसान

एक ओर सरकार डिजिटल पोर्टल, आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात करती है, दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि किसान आज भी खाद के लिए लाइन में खड़े होने को मजबूर हैं। अगर तकनीक के इस युग में भी किसान बुनियादी कृषि इनपुट के लिए दर-दर भटक रहे हैं, तो यह पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

समाधान क्या है?

समाधान नए दावे करने में नहीं, बल्कि मांग आधारित वितरण प्रणाली लागू करने में है। हर जिले और ब्लॉक स्तर पर न्यूनतम अनिवार्य स्टॉक सुनिश्चित करना होगा और खाद वितरण से जुड़ा डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना होगा। सहकारी समितियों और एफपीओ (Farmer Producer Organisations) को मजबूत करना और निजी दुकानों की मनमानी पर सख्त नियंत्रण जरूरी है। सबसे अहम बात यह कि सरकारी दावे खेत स्तर पर सच साबित होने चाहिए।

आखिरी सवाल

किसानों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि बुआई के समय उन्हें खाद के लिए अपमानजनक कतारों में खड़ा नहीं होना पड़ेगा। जब तक “रिकॉर्ड उपलब्धता” वास्तव में समय पर किसानों तक नहीं पहुंचेगी, तब तक ये उपलब्धियां सिर्फ सरकारी फाइलों तक सीमित रहेंगी। अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें खाद की उपलब्धता, मांग, परिवहन, भंडारण और वितरण की समग्र समीक्षा करें, ताकि आने वाले खरीफ और रबी सीजन में किसानों को उनकी जरूरत के मुताबिक खाद समय पर मिल सके।