दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक के रूप में भारत के उभरने के साथ ही देश में भूजल के तेज़ी से घटते भंडार को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता व्यक्त की है, विशेषकर पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख कृषि राज्यों में।

जहाँ राजनीतिक नेतृत्व और कृषि लॉबी ने रिकॉर्ड उत्पादन और निर्यात—ताज़ा वित्तीय वर्ष में 20 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक—पर किसानों और सरकारी नीतियों की सराहना की, वहीं बड़ी संख्या में किसान गहराते जल संकट से जूझ रहे हैं। धान जैसी अधिक जल-आधारित फसल की सिंचाई के लिए उन्हें पहले से कहीं अधिक गहरे बोरवेल खोदने पड़ रहे हैं।

करीब एक दशक पहले पंजाब और हरियाणा के कई जिलों में भूजल लगभग 30 फीट की गहराई पर उपलब्ध था। लेकिन पिछले पाँच वर्षों में तेज़ी से हुई गिरावट के कारण आज बोरवेल 80 से 200 फीट तक खोदने पड़ रहे हैं। किसानों के इन अनुभवों की पुष्टि सरकारी आंकड़ों और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के शोध से भी होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति के पीछे नीतिगत प्रोत्साहन भी एक बड़ा कारण हैं, जो धान की खेती को बढ़ावा देते हैं। धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पिछले दस वर्षों में लगभग 70% बढ़ा है, जबकि बिजली सब्सिडी से भूजल पंप करने की लागत कम होती है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के अविनाश किशोर के अनुसार, “भारत, जो पहले ही जल-संकटग्रस्त देशों में शामिल है, किसानों को विशाल मात्रा में भूजल निकालने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।”

पंजाब और हरियाणा में किसान मुख्य रूप से भूजल पर निर्भर हैं, जिससे स्थिति और भी गंभीर हो गई है। सरकारी आकलनों के अनुसार, दोनों राज्यों के बड़े हिस्से “अतिदोहन” या “संकटग्रस्त” श्रेणी में पहुँच चुके हैं, जहाँ प्रतिवर्ष निकाला जाने वाला पानी प्राकृतिक पुनर्भरण से 35% से 57% तक अधिक है।

किसानों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है—गहरे बोरवेल, लंबी पाइपलाइन और अधिक शक्तिशाली पंपों पर खर्च बढ़ गया है। कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के अनुसार, भारत में एक किलोग्राम चावल का उत्पादन करने में लगभग 3,000 से 4,000 लीटर पानी लगता है, जो वैश्विक औसत से 20–60% अधिक है।

हालाँकि बदलाव के शुरुआती संकेत दिखाई दे रहे हैं। हरियाणा सरकार ने किसानों को कम पानी वाली फसलों—जैसे बाजरा और विभिन्न मिलेट—की ओर प्रोत्साहित करने के लिए प्रति हेक्टेयर 17,500 रुपए की प्रोत्साहन राशि देना शुरू किया है। लेकिन यह योजना फिलहाल केवल एक सीजन के लिए है और बड़े पैमाने पर फसल-पद्धति परिवर्तन नहीं करा पाई है।

भारत आज अपनी घरेलू खपत से कहीं अधिक चावल उगा रहा है, जबकि इसकी आबादी—जो अब दुनिया में सबसे बड़ी है—लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि फसल पैटर्न और जल प्रबंधन नीतियों में समय रहते संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो चावल उत्पादन में यह अग्रणी स्थान देश के लिए गहरे जल संकट का कारण बन सकता है।