भारत में सबसे ज्यादा जूट के किसान और कारखाने पश्चिम बंगाल में हैं। लाखों लोगों को नियमित रोजगार देने में समर्थ जूट मिलों को संकट का सामना करना पड़ रहा है। इसका सीधा असर किसानों और इस उद्योग से जुड़े लाखों लोगों की रोजी रोटी पर पड़ा है। जूट उद्योग को अत्यधिक उत्पादन और विशेषकर खाद्यान पैकेजिंग समेत अन्य कारणों से जूट की बोरियों की घटती मांग के चलते संकट का सामना करना पड़ रहा है। 2021-22 में वार्षिक मांग 38-39 लाख गांठ से घटकर 2024-25 में अनुमानित 30 लाख गांठ रह गई है। इस कारण अधिशेष क्षमता और नौकरियों में कमी आई है।

पश्चिम बंगाल के जूट क्षेत्र में संकट बढ़ता जा रहा है। मिल मालिक कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। सरकार की ओर से मिलने वाले ऑर्डरों में लगातार कमी आ रही है। अपर्याप्त खरीद अनुबंधों और आपूर्ति आदेशों के कारण मिल मालिकों को उत्पादन में कटौती करनी पड़ रही है। जूट उद्योग की मंदी का लाखों श्रमिकों पर असर पड़ रहा है।

इसी सप्ताह पश्चिम बंगाल के राज्य के श्रम मंत्री मलय घटक जूट ने क्षेत्र में बढ़ते संकट के समाधान को लेकर जूट मिल प्रबंधन से मुलाकात करेंगे।
यूनियनों और मिल मालिकों ने मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य सरकार से हस्तक्षेप की अपील की है।
जूट मिलों की ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों ने घटक से मुलाकात की और सरकार की ओर से मिलने वाले ऑर्डरों में कमी पर चर्चा की।

चीनी मिलों सहित सीमेंट उद्योग तक में जूट के बोरे का प्रयोग न होने से जूट मिलों और किसानों को संकट का सामना करना पड़ रहा है। यूनियन प्रतिनिधियों ने जूट आयुक्त कार्यालय से अपर्याप्त खरीद अनुबंधों और आपूर्ति आदेशों के कारण उत्पादन में कटौती के बारे में बताया और उद्योग की मंदी एवं श्रमिकों पर इसके प्रभाव पर गहरी चिंता व्यक्त की।
भारतीय जूट मिल्स एसोसिएशन के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा कि राज्य के श्रम मंत्री से मुलाकात के दौरान इन चिंताओं को रखेंगे ।