छत्तीसगढ़ में इस साल सोयाबीन की फसल पर पीला मोज़ेक वायरस का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। यह स्थिति किसानों के लिए चिंता का विषय बन गई है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुनील नाग ने बताया कि यह वायरस विशेष रूप से सोयाबीन की खेती में देखने को मिलता है। पिछले वर्षों में इसका प्रभाव कम था, लेकिन इस वर्ष इसकी संख्या में अचानक तेज़ इज़ाफा हुआ है।
मुख्य कारण – सफेद मक्खी
डॉ. नाग ने बताया कि पीला मोज़ेक वायरस का मुख्य वाहक सफेद मक्खी है, जो इस वायरस को फैलाती है। इस समय का मौसम सफेद मक्खी के प्रजनन के लिए अनुकूल है, जिससे वायरस का प्रसार बड़े पैमाने पर हो रहा है। इसके लक्षणों में सोयाबीन के पत्तों पर पीला रंग चढ़ना और धीरे-धीरे पूरे पौधे को प्रभावित करना शामिल है।
रोकथाम और बचाव के उपाय
डॉ. नाग ने किसानों को सलाह दी कि फसल के शुरुआती चरण से ही सतर्कता बरतना जरूरी है।
•इंसेक्टिसाइड फ्लोनीकेमिड 50% WG की 200 ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा का छिड़काव करने से शुरुआती अवस्था में सफेद मक्खी को नियंत्रित किया जा सकता है।
•यदि वायरस की शुरुआत में ही नियंत्रण नहीं किया गया तो यह तेजी से फैल सकता है, जिससे पूरी फसल बर्बाद हो सकती है।
संक्रमण फैलने पर अंतिम उपाय
डॉ. नाग ने बताया कि जब वायरस फैल जाता है, तो उसका नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में
•प्रभावित पौधों को खेत से उखाड़ कर जला देना या नष्ट करना ही अंतिम उपाय होता है, ताकि वायरस और सफेद मक्खी का संक्रमण स्वस्थ पौधों तक न पहुंचे।
•हर दिन सुबह और शाम फसल का निरीक्षण करना और सफेद मक्खी की संख्या बढ़ने पर समय पर छिड़काव करना बेहद जरूरी है।
कृषि तकनीक और जैविक उपायों की जरूरत
उन्होंने किसानों से अपील की कि वे इंजीनियर्ड कृषि तकनीक अपनाएं, आवश्यक फसल प्रबंधन तकनीक का पालन करें और जैविक उपायों का भी इस्तेमाल करें, ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके।



