धान की बुवाई पूरी, पंजाब में इस बार रिकॉर्ड फसल की उम्मीद; विशेषज्ञों ने पर्यावरणीय संकट पर जताई चिंता – Khalihan News
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धान की बुवाई पूरी, पंजाब में इस बार रिकॉर्ड फसल की उम्मीद; विशेषज्ञों ने पर्यावरणीय संकट पर जताई चिंता

धान की बुवाई पूरी, पंजाब में इस बार रिकॉर्ड फसल की उम्मीद; विशेषज्ञों ने पर्यावरणीय संकट पर जताई चिंता

इस खरीफ सीजन में पंजाब धान की रिकॉर्ड पैदावार के करीब है। राज्य में अब तक 30.94 लाख हेक्टेयर में धान की बुवाई हो चुकी है। किसान अनुमानित बंपर फसल से खुश हैं, लेकिन कृषि विशेषज्ञ लंबे समय में इस पर निर्भरता को राज्य के पारिस्थितिक तंत्र के लिए गंभीर खतरा बता रहे हैं।

पंजाब इस साल 185 लाख टन धान उत्पादन का अनुमान लगा रहा है, जो पिछले साल के 182 लाख टन के मुकाबले मामूली वृद्धि है। कृषि निदेशालय के आंकड़ों के अनुसार, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत मोटे धान की किस्में 25.19 लाख हेक्टेयर और प्रीमियम बासमती किस्में 5.75 लाख हेक्टेयर में बोई गई हैं।

आदर्श मौसम ने दी बंपर फसल को रफ्तार
कृषि निदेशक जसवंत सिंह ने कहा, “बुवाई के समय वर्षा अच्छी रही और तापमान भी अनुकूल था, जिससे फसल बेहतर होने की उम्मीद है। इसके अलावा, 50,000 से 60,000 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में भी धान बोए जाने की संभावना है।”

पानी की कमी और प्रदूषण बना बड़ी चुनौती
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह परंपरा राज्य के जल संसाधनों को तेजी से समाप्त कर रही है। पंजाब में सिंचाई के लिए लगभग 14.5 लाख ट्यूबवेल इस्तेमाल किए जा रहे हैं और राजस्व ब्लॉकों का 70% हिस्सा डार्क ज़ोन में चला गया है। औसतन हर साल भूजल स्तर एक मीटर गिर रहा है, जो कृषि के भविष्य पर बड़ा खतरा है।

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के पूर्व कुलपति सरदारा सिंह जौहल ने कहा, “पंजाब में धान की पैदावार कोई समस्या नहीं है, समस्या पानी की है। यदि पानी नहीं बचा तो कोई फसल टिक नहीं पाएगी। इसके लिए हमें धान की खेती बंद करनी होगी।”

फसल विविधीकरण की जरूरत
पूर्व कुलपति बीएस ढिल्लों ने कहा कि धान पर निर्भरता पानी की कमी और पर्यावरणीय क्षरण के कारण टिकाऊ नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि राज्य को मक्का, मोटे अनाज और कपास जैसी जल-कुशल फसलों की ओर शिफ्ट करना चाहिए ताकि जल संसाधनों पर दबाव कम हो।

भंडारण संकट और पराली जलाना भी चिंता का विषय
इस बार पंजाब में 185 लाख टन नए चावल का उत्पादन होने की संभावना है, जो पिछले साल के 80 लाख टन के स्टॉक में और इजाफा करेगा। इससे भंडारण सुविधाओं और वित्तीय संसाधनों पर बोझ बढ़ सकता है। कृषि निदेशक जसवंत सिंह ने कहा, “किसानों को अल्पकालिक लाभ तो मिलेगा, लेकिन राज्य को अतिरिक्त स्टॉक के कारण लॉजिस्टिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।”

सबसे बड़ी पर्यावरणीय चिंता धान की पराली का जलाना है। हर साल पंजाब में लगभग 190 लाख टन पराली निकलती है, जिसका अधिकांश हिस्सा खेतों में जला दिया जाता है। इससे उत्तरी भारत में खासकर सर्दियों के दौरान दिल्ली जैसे शहरों में वायु प्रदूषण और स्मॉग की समस्या गंभीर हो जाती है।

पराली प्रबंधन के लिए ₹500 करोड़ की मांग
राज्य सरकार ने पराली प्रबंधन के लिए केंद्र से ₹500 करोड़ की मांग की है। 2018 से अब तक पराली के इन-सिचु और एक्स-सिचु प्रबंधन के लिए मशीनरी पर ₹1,700 करोड़ की सब्सिडी दी जा चुकी है।

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