बिज़नेस डेस्क – भारत के कीटनाशक (पेस्टीसाइड) बाज़ार में अब तेज़ी की सबसे बड़ी वजह कीटनाशक या फफूंदनाशी नहीं, बल्कि शाकनाशी (हर्बिसाइड) बन रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह है खरपतवार निकालने के लिए मजदूरों की कमी, जिससे किसान अब रासायनिक समाधान की ओर अधिक झुक रहे हैं।
कीटनाशक क्या करते हैं?
फसलों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायनों को सामूहिक रूप से पेस्टीसाइड कहा जाता है। इनमें कीटनाशक (Insecticides) फसलों को कीटों से बचाते हैं, जो या तो सीधे पौधों को खा जाते हैं या फिर बीमारियां फैलाते हैं।
उदाहरण के तौर पर व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर धान के पौधों का रस चूसने के साथ-साथ फिजी वायरस भी फैलाता है, जिससे पौधे बौने रह जाते हैं। पंजाब और हरियाणा में इस खरीफ सीजन में कई किसानों ने इस बीमारी की शिकायत की है।
कीटनाशकों की तीन मुख्य श्रेणियां
1.इनसेक्टिसाइड (कीटनाशक) – कीट नियंत्रण के लिए
2.फंगिसाइड (फफूंदनाशी) – ब्लास्ट, शीथ ब्लाइट (धान) या पाउडरी मिल्ड्यू, रस्ट (गेहूं) जैसी बीमारियों से बचाव
3.हर्बिसाइड (शाकनाशी) – खरपतवार की वृद्धि रोकने या खत्म करने के लिए
हर्बिसाइड की तेज़ी से बढ़ती मांग
भारत का संगठित घरेलू कीटनाशक बाज़ार लगभग ₹24,500 करोड़ का है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा इनसेक्टिसाइड का है (₹10,700 करोड़), उसके बाद हर्बिसाइड (₹8,200 करोड़) और फंगिसाइड (₹5,600 करोड़) का।
लेकिन, सबसे तेज़ विकास हर्बिसाइड सेगमेंट में हो रहा है, जिसकी सालाना वृद्धि दर 10% से अधिक है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह रुझान दर्शाता है कि भारतीय कृषि में श्रम संकट और लागत नियंत्रण की ज़रूरत, कीटनाशक बाज़ार को सतत नवाचार और आधुनिक फसल सुरक्षा समाधानों की ओर धकेल रही है।



