खाद्य मंत्रालय ने सभी चीनी मिलों को कपड़ा मंत्रालय द्वारा अधिसूचित जूट पैकेजिंग सामग्री अधिनियम, 1987 के तहत इसके नियमों के बारे में पत्र लिखा है। इसके तहत चीनी की 20 फीसदी पैकिंग जूट के थैलों या बोरियों में होगी। सरकार ने इस नियम को अनिवार्य कर दिया है। ये इसलिए किया गया है क्योंकि यह पता चला है कि कुछ मिलें सरकार के आदेश का पालन नहीं कर रही हैं।
चीनी निदेशालय के दिसंबर 2024 के पत्र को सभी चीनी मिलों के प्रमुखों के साथ साझा करते हुए खाद्य मंत्रालय ने 27 मार्च को उन्हें तत्काल नियमों के पालन करने को कहा है। इस पत्र में कहा गया है कि सभी चीनी निर्माताओं को कपड़ा मंत्रालय द्वारा कानून के तहत अधिसूचित चीनी के कुल उत्पादन का 20 प्रतिशत अनिवार्य जूट पैकेजिंग के निर्देशों का पालन करना आवश्यक है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले से जूट मिलों और सहायक यूनिट्स में काम करने वाले चार लाख श्रमिकों को राहत मिलेगी। जूट वर्ष 1 जुलाई से 30 जून तक होता है।
एक आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया कि इस प्रस्ताव से भारत में कच्चे जूट और जूट पैकेजिंग सामग्री के घरेलू उत्पादन क्षेत्र के हितों की रक्षा होगी। मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति की बैठक में लिए गए फैसले के बारे में जानकारी देते हुए कहा गया कि जूट वर्ष 2023-24 के लिए अनुमोदित जरूरी पैकेजिंग मानदंडों के तहत 100 प्रतिशत खाद्यान्न और 20 प्रतिशत चीनी की जूट की थैलियों में पैकिंग करना होगा।
जूट पैकेजिंग सामग्री के आरक्षण के तहत देश में उत्पादित कच्चे जूट का लगभग 65 प्रतिशत खपत होता है। विज्ञप्ति में कहा गया कि इस फैसले से पर्यावरण की रक्षा में मदद मिलेगी। केंद्र सरकार खाद्यान्नों की पैकिंग के लिए हर साल लगभग 12,000 करोड़ रुपये के जूट बोरे खरीदती है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, करीब चालीस लाख किसान परिवार, तीन लाख मिल श्रमिक और एक लाख व्यापारी कच्चे जूट की खेती और प्रोसेसिंग में जटिल रूप से शामिल हैं। जूट को पटसन, पाट या पटुआ के नाम से भी जाना जाता है। बांग्लादेश और नेपाल से आयातित जूट पर एंटी डंपिंग ड्यूटी अगले पांच साल के लिए जारी है।



